• Roy

औरत, समान या सामान?

घूरना और देखना, इन दोनों शब्दों के मतलब में उतना ही अंतर है जितना की इनके अक्षरों में हैं। हर एक औरत को पता है की उसे कब देखा जा रहा और कब घूरा जा रहा है। औरतों के अंदर यह मैकेनिज्म शायद पैदा होने के साथ ही आ जाती है। आखिरकार आये भी क्यों न! एक महीने की बच्ची हो या अस्सी साल की बूढी औरत, ये हवस की नज़र किसी में फ़र्क़ करना नहीं जानती। सब को एक "सामान" समझना यहीं इसकी फितरत है और आप अगर सब कुछ भूल कर इसकी फितरत को समझने के बजाय इलज़ाम औरत और लड़कियों के सर डालते हैं तो आपसे बड़ा गुनहगार कोई नहीं है। कितने ही जगह हम यह पढ़ते हैं कि हर कोई समान है। लेकिन आज के वक़्त में जिस तरह से औरत को देखा जाता है वह समान कम "सामान" ज़्यादा समझी जाती है।




हालाँकि, आप इस बात पर बोल सकते हैं कि हर मर्द ऐसा नहीं है, हर मर्द को को एक जैसा नहीं बोल सकते लेकिन यह खुद में एक रहस्य है कि आखिर हर औरत अपने ज़िन्दगी में एक न एक बार ज़रूर Sexual abuse से गुजरती है। बचपन से ही परिवार में हमें सिखाया जाता है कि लड़की आपकी बहन है, औरत आपकी माँ समान है, लेकिन यह कभी नहीं बोलते कि औरत खुद में एक इंसान है और उसे इंसान समझ कर ही इज़्ज़त दें ना कि बहन, माँ, दादी, बेटी मान कर। वह आपकी कुछ नहीं लगती लेकिन फिर भी आपको यह अधिकार नहीं है कि आप उसे सामान समझ कर देख लें या छू ले या कुछ भी करें। यह एक बिमारी है जिसमें आपको लगता है कि आप सबसे ऊपर हैं और आप जो चाहेंगे आपको वो मिल जाएगा और फिर जब आपको वह नहीं मिलता तब आप बहाने और इलज़ाम लगाते हैं। आपका Male Ego इतना कमज़ोर है की किसी के ना कहने से टूट जाता है। खैर, इस देश के संविधान में हर एक इंसान समान है। औरत को देवी दर्ज़ा देने से पहले देश के लोगों को उन्हें समान नज़र से देखना शुरू करना चाहिए। शायद बदलाव तब संभव है।


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