• Roy

मजदूर की मजबूरी

मजदूर की मजबूरी कुछ तो होगी तभी वो इस lockdown में भी सड़क पर दौड़ रहा है। आखिर अमीरों से हुई गलती की सजा मजदूरों को क्यों मिल रही है? देश के बाहर से आये इस बीमारी के वजह से देश में बसे हुए लोगों को किस हिसाब से अपने अपने घरों के तरफ जाने के लिए जद्दोजहत उठानी पड़ रही है।


Taken from New Indian Express

lockdown के वजह से हर एक इंसान घर के अंदर बंद है और lockdown का मक़सद भी यहीं था लेकिन क्या Lockdown भी अमीर-गरीब के लिए अलग है? यह बीमारी यह वायरस चाहे किसी के वजह से भी भारत में आया हो लेकिन क्या इस वायरस की कीमत मजबूर मजदूर चूका रहे हैं?

इस देश में मजदूर कौन है यह सबको पता है, मजदूर बनने की प्रक्रिया हिंदुस्तान में काफी भयावह है। आप को पढाई से दूर रखा जाएगा, आपको resources से दूर कर दिया जाएगा क्योंकि आपके पास पैसा नहीं है और जब आप बाहर निकलेंगे तो आपके पास मजदूर बनने के अलावा और कोई जॉब vacancy नहीं बचती। दिहाड़ी मजदूरों के नंबर में चीन के बाद भारत का नाम आता है। 2012 के आंकड़ों के हिसाब से देश में मजदूरों की संख्या अड़तालीस करोड़ के आस पास थी और यह संख्या आठ साल में कितना बढ़ा होगा इसकी कल्पना आप कर सकते हैं। दिहाड़ी मजदूर जिसके एक दिन के काम की कीमत दो सौ से लेकर चार सौ रूपये तक की होती है उस मजदूर से सरकार किस इकॉनमी की कीमत वसूल रही है?

इस देश में गरीब होना, एक दुर्भाग्य है और मजदूर होना पाप है। एक तरफ ये मजदूर अपने घर नहीं जा सकते क्योंकि सरकार ने बिना सोचे समझे रेल की सेवाएं बंद कर दी और दूसरी तरफ उन्हें घर पहुंचाने से भी मना कर दिया। राज्य सरकारों ने इन मजदूरों को वापस लेने से मन कर दिया। बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार ने साफ़ साफ़ शब्दों में इन्हे वापस बुलाने की बात को बेवकूफी बताई।


Taken from Economic Times

उत्तर प्रदेश और कुछ राज्यों ने तो लेबर राइट्स की धज्जियां उड़ाते हुए लेबर राइट्स और वर्कर राइट्स को तीन सालों के लिए सस्पेंड कर दिया है। इस खतरनाक कदम के वजह से अब मजदूरों की दिहाड़ी, उनके स्वास्थ्य और रहने की ज़िम्मेदारी अमीर लोगों के सर से टाली जा सकती है। "भारत धूलों से भरा, आंसुओं से गीला, भारत अब भी व्याकुल विपत्ति के घेरे में. दिल्ली में तो है खूब ज्योति की चहल-पहल, पर, भटक रहा है सारा देश अँधेरे में"- रामधारी सिंह दिनकर

35 views0 comments

Recent Posts

See All