सिन्धी समाज और थदडी

1947 के विभाजन के बाद हजारों सिन्धी परिवार सिंध प्रांत को छोड़कर भारत के अलग-अलग हिस्सों में आकर बसे, क्योंकि सिंध प्रांत अविभाजित भारत के हिस्से से पाकिस्तान के हिस्से में आ गया था।।


अपनी सम्पत्ति भूमि और कमाई के साधनों को पीछे छोड़कर, अपने जीवन के पुनः निर्माण के लिए अनजान जगह, अनजान बोली और अनजानें लोगों के सामने अपनी मेहनत से स्वयं को पुनः स्थापित करना ही सिन्धी समाज के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी।


साथ ही अपनी सभ्यता संस्कृति और रीति रिवाजों, त्योहारों और भाषा को बचाएं रखना भी आवश्यक था। निश्चित रूप से सिन्धी समाज ने इस चुनौती को स्वीकार किया और अपनी मेहनत के बल पर परमार्थी बनकर स्वयं को स्थापित किया और सिन्धी समाज का जो मुकाम आज है वह किसी को बताने की आवश्यकता नहीं है। आज इस कोरोना काल में भी समाज ने बढ़ चढ़ कर सेवा कार्यों में हिस्सा लिया है। स्वयं को स्थापित करने की जद्दोजहद के बावजूद समाज ने अपने रीति रिवाजों और त्योहारों को जिंदा रखा और आज विभाजन के 72 साल के दर्द के बाद भी सिन्धी समाज अपने त्योहारों को पूरे उत्साह और एकता के साथ मनाता है।


सिन्धी समाज द्वारा मनाए जाने वाले त्योहारों में से एक मुख्य त्योहार है `थदडी '। रक्षाबंधन के 7 दिन बाद सिन्धी समाज द्वारा मनाए जाने वाला एक मुख्य त्योहार। देवी माता को प्रसन्न करने के लिए ठंडे खाने (एक दिन पहले पकाएं हुए) का भोग लगाया जाता है। थदडी़ ठंडा खाना दही और अचार जैसे समर्थक जैविक खाद्य पदार्थों का परिवार सहित उपभोग का एक दिन है।यह शीतला अष्टमी और बसौडा त्योहारों के समान है जहां आम तौर पर घर की महिलाएं लोला (मोटी मीठी रोटी),कोकी(नमकीन मोटी रोटी), परांठा इत्यादि जैसे खाना बनाती है और अगले दिन पूरे परिवार को ठंडे भोजन का उपभोग करना होता है।


` थदडी' का मतलब ठंडा है यह शीतला माता को समर्पित है। जुलाई और अगस्त का महीना बरसात का मौसम होता है, इसी मौसम में विभिन्न प्रकार की बीमारियों के जीवाणु सक्रीय हो जातें हैं। इन्हीं बीमारियों में चिकेनपॉक्स मुख्य है। चिकेनपॉक्स को हम आम बोलचाल में `माता' भी कहते हैं। यह मुख्य रूप से देवी का प्रकोप माना जाता है।माना जाता है कि माता परेशान हैं जो कि चिकेनपॉक्स के रूप में है। लोगों ने इसे माता का गुस्सा माना और गुस्से को ठंडा करने का प्रयास किया, गुस्से को ठंडा (थददा) करने का प्रयास ही थदडी है।शीत ऋतु के आगमन का प्रतीक शीत भोजन (थददा) माता को समर्पित करके माता को रिझाने का प्रयास ही थदडी है।


ऐसा माना जाता है कि हजारों साल पहले जब मोहनजोदाड़ो की भूमि खोदी गई थी तब शीतला माता की एक प्रतिमा पाईं गईं थीं और तब से यह दिन देवी माता को समर्पित है।


बच्चों और किशोरों को विशेष रूप से प्रार्थना समारोह में शामिल किया जाता है। जबकि परिवार के छोटे सदस्यों को टोकन राशि दी जाती है, कुछ उपहार,फल और अंक अन्य व्यंजनों को करीबी रिश्तेदारों में भी भेजा जाता है,जिसे ` थदडी़ का डिण ' कहा जाता है।


विज्ञान और प्रौद्योगिकी के आगमन के साथ सिद्धान्तों में बदलाव हो सकता है लेकिन एकता और उत्सव की मूल भावना अभी भी सिन्धी समुदाय को इस त्यौहार का जश्न मनाने के लिए प्रेरित करती हैं।


थदडी़ के दिन ठंडा ही खाने का प्रयास करें, बच्चों को भी प्रेरित करें, बाजार से बनें हुए व्यंजन ना लाएं,अन्यथा इस त्यौहार की सार्थकता समाप्त हो जाएगी। इस अनुष्ठान में महिलाओं के साथ बच्चे बड़े सभी जुड़े,तभी इस त्यौहार की सार्थकता है। एक बात ओर, कृपया इस दिन मदिरा और मांस का सेवन बिल्कुल ना करें। देवी माता की कृपा सदैव बनी रहे।

जैसा कि आप सबको ज्ञात है कि वैश्विक बीमारी कोरोना का दौर चल रहा है, बचाव ही इसका उपचार है इसलिए आप सभी सावधानी बरतें और अपने आसपास स्वच्छता बनाए रखें।

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