• Roy

Why SMASH PATRIARCHY?



भारत में नारीवाद की परिभाषा हर आदमी और हर औरत के हिसाब से हर गली और हर घर में बदलती रहती है। चाहे कितना भी औरत को देवी या देवताओं के समकक्ष समझने के लिए बोला जाए लेकिन देश में औरत और जो खुद को औरत मानते हैं उनकी क्या दशा है यह सबको पता है।


अगर किसी औरत ने बिना बाज़ू वाले कपड़ें पहन लिए तो बाज़ू वाली औरत या मर्द को दिक्कत होने लगती है। कोई औरत किसी मर्द के साथ सड़क पर चल ले और हाथ पकड़ ले तो संस्कार और इज़्ज़त की दुहाई दी जाने लगती है। और सबसे आखिरी में ठीकरा फोड़ा जाता है- फेमिनिज्म के माथे।


हाल में ही जिस तरीके से Rhea Chakarborty के पीछे हिंदुस्तान की जनता चुड़ैल और घर-तोड़ने वाली बोल कर पीछे पड़ी हुई थी उससे तो आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि यह बात भी गलत है कि अनपढ़ लोग औरतों को गालियां देते हैं। जबकि अधिक मामलों में पढ़े लिखे, अच्छे घरानों के लड़के ही ऐसे hate crimes में इन्वॉल्व रहते है। अगर आप बॉयज लॉकर रूम वाला किस्सा न भूले हों।


अब यह भी बात है कि क्या सिर्फ मर्दों के वजह से आज इस देश में औरतों की यह हालत है? तो इसका जवाब है हाँ। मर्द तो हैं ही enhancer लेकिन मर्दवादी जनता के ऊपर इस दशा की ज़िम्मेदारी जाती है। जनता में औरत, मर्द और हर वो व्यक्ति आता है जो ज़िंदा है और साँस ले रहा है।


अब मर्दवाद या patriarchy इस दशा की ज़िम्मेदार कैसे है? इसीलिए क्योंकि मर्दवादी समाज में हर एक काम मर्द तय करता है, दूसरें लोगों को उनके काम समझाता है और फिर उन्हीं कामों को लोग करते हैं। हर मर्द गलत है या ख़राब है यह तो कोई साबित नहीं कर सकता लेकिन हर काम में मर्दों को अलग जगह और औरतों को अलग जगह मिली है जो खुद मर्दों ने ही बनाई है।


और आज भी मर्दवादी जनता यहीं सोच रही कि हर कोई वहीँ पाषाण युग के ढर्रे पर चले। आज के वक़्त में आपके पुराने नियम और वसूल सब किनारे रखे जाएंगे क्योंकि कोई चीज़ पुरानी है तो वह चीज़ सही होगी यह ज़रूरी नहीं होती। नारीवाद में नारी शब्द लग जाने से आपके masculinity पर आघात होगा यह सोच कर नारीवाद नहीं लाया गया। नारीवाद इसीलिए आया है ताकि लोगों को, खास कर औरतों को यह समझाया जाए कि आखिर तुम क्यों मर्दों के बनाये वसूलों, सिद्धांतों और सोच पर चलना चाहती हो जो तुम्हें रोक रहे हैं किसी खास क्षेत्र में बढ़ने से?


हर काम को करने के लिए अलग लोग चाहिए लेकिन कौन सा काम कौन करेगा, ये जेंडर या लैंगिक भेदभाव से तय नहीं किया जा सकता है। एक औरत उतनी ही क्षमता के साथ खेत में काम कर सकती है जितनी क्षमता से एक पुरुष कर सकता है। एक औरत अपने बल पर एक कंपनी चला सकती है जैसे कि एक मर्द चला सकता है।

अब एक आदमी पहाड़ तो किसी भी हालात में अपने सर पर रख कर चल नहीं सकता तो यहाँ comparison करना सही नहीं है।


आज की बात बस इतनी सी है कि आप चाहे मर्द हो या आप चाहे औरत हो, आपके सपने, आपकी सोच और आपका काम किसी पाषाण युग के शिला पर लिखे शब्दों से कहीं आगे है। और कोई भी शिला या चर्मपत्र या किसी पुरुष के लिखे शब्द आपको describe नहीं करेगा।


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